
आज आखिरकार वह दृश्य दिख ही गया—
मेरे ही घर की छत से, बर्फ़ की चादर ओढ़े पहाड़।
वाह! सच में मज़ा आ गया।
दिल्ली से मैं इसी मौसम की तलाश में यहाँ आया था। कई सालों से मेरी आदत बन गई थी कि दिसंबर–जनवरी आते ही अहमदाबाद या गोवा चला जाता था। पर इस बार ऐसा संयोग बना कि
इन पचास ठंडे दिनों को यहीं, अथूरवाला में ही जिया जाए।
और नए साल 2026 ने पहली बार मुझे यह तोहफ़ा दे दिया।
गुप्त नवरात्रि के दिन, 23 जनवरी—
बसंत पंचमी का संयोग,
और सामने पहाड़ों का दृश्य…
वह भी मेरे अपने घर से।
पीछे मुड़कर देखता हूँ तो दिल्ली की भागदौड़ में गुज़रे बीस–पच्चीस साल याद आते हैं। वही दौड़, वही शोर, वही हवा जिसमें साँस तो थी, पर ऑक्सीजन कम होती जा रही थी। शायद उसी जीवन ने मुझे अंदर ही अंदर किसी और चीज़ के लिए तरसा दिया था—
ऐसी हवा के लिए जिसमें साँस भरते ही मन हल्का हो जाए,
ऐसे दृश्य के लिए जो चेतना को हिला दे,
अक्सर घरवाले पूछते थे—
“यहाँ है ही क्या?”
“बोरियत नहीं होती?”
सही बात है, यहाँ कोई आग, कोई तेज़ प्रेरणा नहीं दिखती हैं।
लेकिन आज अगर वही सवाल मुझसे किया जाए, तो मेरा जवाब सीधा है—
यहाँ ऐसे सैकड़ों मनोहर दृश्य हैं,
जिन्हें देखने के लिए किसी होटल के कमरे का दस हज़ार रुपये प्रति दिन नहीं चुकाना पड़ता।
यहाँ बस पहाड़, कम वायु गुणवत्ता सूचकांक और केवल शुद्ध पानी ही नहीं है।
जब माँ और भाई को यह दृश्य दिखाया,
तो उनकी आँखों की चमक,
चेहरे का सौंदर्य,
और हृदय की प्रफुल्लता—
किसी स्टार्टअप की सफलता से कम नहीं थी।
फर्क बस इतना था कि
इसमें न पैसा लगा,
न मेहनत,
न कोई रणनीति।
यह पुरस्कार था—
प्रकृति के थोड़ा और निकट होने का।
और हाँ,
मेरा एक स्टार्टअप तो खड़ा ही है।
मेरा अपना घर।
जो आज किसी हिल-व्यू होटल से कम नहीं—
बस फर्क यह है कि
इसमें हम किराएदार नहीं,
निवासी हैं।